जनता को पुल तो मिल गया, राधेश्याम को इंसाफ कब मिलेगा?
इंदौर।
आज मालवा मिल का नया पुल जनता के लिए खोल दिया गया। निगम के अफसर और नेता बड़ी शान से रिबन काटेंगे, फोटो खिंचवाएंगे और सोशल मीडिया पर विकास का डंका बजाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि जिस गरीब राधेश्याम की जान इसी पुल की लापरवाही में गई थी, उसे और उसके परिवार को आज तक इंसाफ क्यों नहीं मिला?
मौत सिस्टम की लापरवाही से, सजा किसे मिली?
10 अगस्त की रात तेज बारिश में अंधेरे और बिना बैरिकेड्स के खुले छोड़े गए निर्माणाधीन पुल से राधेश्याम कुशवाह (34) नीचे गिर पड़े। अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जान नहीं बची।
- ठेकेदार ने साइट खुली छोड़ दी थी।
- निगम के जिम्मेदारों ने आँखें मूंद ली थीं।
- और जब हादसा हुआ तो सबने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
पुल बनाने का दावा था 100 दिन का, लेकिन 140 दिन बीत चुके थे। और इसी देरी और लापरवाही की कीमत राधेश्याम ने अपनी जान देकर चुकाई।
परिवार का संघर्ष: पुल बन गया, सर्टिफिकेट नहीं मिला
राधेश्याम की मौत को दो महीने हो चुके हैं।
- परिवार को अभी तक मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिला।
- मुआवजे का नाम तक नहीं।
- माँ गीता देवी दोनों किडनी खराब, डायलिसिस पर।
- विधवा पत्नी राखी रोज दर-दर की ठोकरें खा रही है।
निगम कहता है – “ठेकेदार जिम्मेदार है।”
ठेकेदार कहता है – “हमसे पूछो क्यों हादसा हुआ?”
और इस खींचतान में एक गरीब परिवार इंसाफ की भीख मांग रहा है।
सवाल सिस्टम से
- क्या जनता को पुल देने भर से जिम्मेदारियाँ पूरी हो जाती हैं?
- क्या राधेश्याम की जान की कोई कीमत नहीं थी?
- क्या यह सिस्टम हमेशा गरीबों की लाश पर ही विकास के रिबन काटता रहेगा?
आज 6 करोड़ का पुल लोकार्पित हुआ, लेकिन एक 6 रुपये की गुलाबी पर्ची (मृत्यु संबंधी कागज) अब तक परिवार को नहीं मिली। यही है हमारे सिस्टम का असली चेहरा।
👉 पुल तो जनता को मिल गया, पर सवाल यही है — राधेश्याम की माँ को इंसाफ कौन देगा?
👉 सिस्टम जनता को सड़कों और पुलों की सौगात देता है, लेकिन इंसाफ हमेशा अधूरा छोड़ देता है।
