Apr 18 2026 / 4:26 PM

चूहा मारकर खाते थे लालू यादव

चूहा खाने से लेकर बिहार की सत्ता और फिर परिवार की राजनीति तक

1990 का दशक… दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस।
कुर्ता-पायजामा पहने एक नेता कमरे में घुसते हैं। पत्रकार जुटे हुए हैं। नेता मुस्कुराते हुए कहते हैं—
“प्रेस वार्ता तो होई जाएगा… चलिए पहले पान खा लिया जाए।”

सबको पान खिलाने के बाद कॉन्फ्रेंस शुरू हुई। कुछ दिन बाद वही नेता फ्लाइट में थे। अचानक बोले—
“सुनो… पान तो खिला दए… अब थूकें कहाँ?”
हड़बड़ाए अफसर ने अपना पाउच बैग निकालकर दिया। नेता जी ने उसी में थूक दिया— “पच्च!”

ये कोई मामूली नेता नहीं थे। ये थे लालू प्रसाद यादव, जो आगे चलकर बिहार के सबसे करिश्माई और विवादित मुख्यमंत्री बने।


गरीबी, चूहा और दूध-भात

लालू की कहानी एक गरीब ग्वाले के घर से शुरू होती है।
1948, गोपालगंज का फुलवरिया गांव। पिता थे ग्वाला, 2 बीघा जमीन और कुछ मवेशी ही संपत्ति थी। लालू सात भाई-बहनों में छठे नंबर पर। घर घास-फूस की झोपड़ी, खाने को दूध-भात और कभी-कभी मोटे अनाज।

लालू खुद बताते हैं—
“हम तो चूहा खाकर बड़े हुए हैं। चूहा पकड़कर नमक-मिर्च लगाते और आग में भूनकर खा जाते।”

गरीबी के ताने भी मिले। जमींदार ताना मारते—
“देखा हो… ई ग्वाला का बेटा पढ़ेगा-लिखेगा… बैरिस्टर बनेगा का?”
यहीं से लालू के भीतर बगावत की चिंगारी भड़क गई।


पटना की राह और राजनीति का स्वाद

पटना आना लालू की जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट था। वेटनरी कॉलेज के पास स्कूल में पढ़ाई शुरू हुई। नाटक खेले, ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में शायलॉक बने और बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड जीता।
रेडियो पर आने वाले ‘लोहा सिंह’ के डायलॉग्स याद कर सबको सुनाकर हंसा देते।

स्कूल से लेकर कॉलेज तक भीड़ जुटाने की कला लालू में थी। पटना यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला और राजनीति का स्वाद भी। एनसीसी में जूते पहने, पुलिस की नौकरी पाने दौड़े भी—
“यूनिफॉर्म और बूट फ्री में मिल जाता, लेकिन तेज नहीं दौड़ पाए, फेल हो गए।”


छात्र नेता से सांसद तक

1970 में यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ महासचिव, 1973 में अध्यक्ष।
जेपी आंदोलन जुड़ा और जेल भी गए।
1977— 29 साल की उम्र में छपरा से सांसद।
1980 में हारे, फिर विधानसभा पहुंचे और विपक्ष के नेता बने।

फरवरी 1990— जनता दल चुनाव जीता, पर बहुमत अधूरा। बीजेपी के समर्थन से सरकार बनी और मुख्यमंत्री की दौड़ में लालू भी कूद पड़े। वोटिंग हुई और लालू जीत गए। 42 साल की उम्र में बिहार के सीएम।


लालू स्टाइल: चौपाल में कैबिनेट और ‘खैनी है क्या?’

सीएम बनने के बाद लालू ने पब्लिक स्टाइल ही अपनाया।
चार महीने तक वेटरनरी कॉलेज के प्यून क्वार्टर में रहे।
कैबिनेट मीटिंग गांव की चौपाल जैसी, अफसरों को सड़क पर तलब कर वहीं बर्खास्त कर देना।
कभी फ्रेजर रोड पर खड़े होकर खुद ट्रैफिक संभालना, कभी गरीब बच्चों को टॉफी बांटना।

गांव जाते तो पूछते—
“खैनी है क्या?”
हेलिकॉप्टर खेतों में उतारकर लोगों को बिठा देते।

अफसर कहते—
“न खाता, न बही; जो लालू कहें, सो सही!”


सत्ता, घोटाला और राबड़ी देवी

1990 में आडवाणी की गिरफ्तारी की, बीजेपी ने समर्थन वापस लिया। लेकिन लालू ने बीजेपी के 10 विधायक तोड़ लिए। सत्ता बचाई और खुद को और मजबूत किया।

लेकिन 1996 आया और सामने आया 950 करोड़ का चारा घोटाला।
सीबीआई जांच हुई, चार्जशीट दाखिल हुई। इस्तीफे का दबाव बढ़ा।
लालू ने 5 जुलाई 1997 को नई पार्टी बनाई— राष्ट्रीय जनता दल।
25 जुलाई को इस्तीफा दिया और उसी दिन पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बना दिया।


जेल, खाना और भगवान शिव

जेल गए तो ऐलान किया—
“सपने में भगवान शिव आए और कहा— मांसाहार छोड़ दो।”
लालू ने नॉनवेज छोड़ दिया, लेकिन कुछ साल बाद फिर खाने लगे और बोले—
“भगवान शिव से माफी मांग ली।”

कभी घर पर खुद पालक-गोश्त बनाते, कभी तालाब में मछलियां पालते। खाने-पीने के शौक के लिए भी लालू मशहूर थे।


राजनीतिक विरासत और पारिवारिक ड्रामा

2000 के दशक में रेलमंत्री बने और अपनी छवि फिर चमकाई।
2013 में चारा घोटाले में 5 साल की सजा हुई और चुनाव लड़ने पर बैन लगा।

बाद में बेटों को राजनीति में उतारा—
तेजस्वी डिप्टी सीएम बने, तेजप्रताप मंत्री।
2022 में लालू ने औपचारिक रूप से पार्टी की कमान तेजस्वी को सौंप दी।

लेकिन 2025 में बड़ा ड्रामा हुआ—
तेज प्रताप के रिलेशनशिप पोस्ट के बाद लालू ने उन्हें परिवार और पार्टी से बाहर कर दिया।
आज तेज प्रताप अलग पार्टी बनाकर लालू और तेजस्वी के खिलाफ खड़े हैं।


लालू की कहानी का सार

गांव के गरीब ग्वाले से लेकर मुख्यमंत्री, रेलमंत्री और फिर जेल तक…
लालू यादव की कहानी सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि बोलचाल, किस्सों और अनोखी शैली की भी है।
लोग कहते हैं—
“लालू जब बोलते हैं तो राजनीति भी हंसी-मजाक लगती है, और जब चुप रहते हैं तो विपक्ष भी बेचैन।”

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