Jul 30 2026 / 7:45 AM

कफ सिरप बना बच्चों का कातिल: 20 दिन में 7 मासूमों की मौत, अब भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे 5

सर्दी-खांसी में राहत देने वाला कफ सिरप ही बच्चों की जान का दुश्मन बन गया। छिंदवाड़ा जिले में पिछले 20 दिनों में सात मासूमों की मौत हो चुकी है और पांच बच्चे अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।

शुरुआती जांच में सामने आया है कि जिन कफ सिरप का इस्तेमाल बच्चों को किया गया, उनमें डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) नामक जहरीला केमिकल मिला हुआ था। यही टॉक्सिन बच्चों की किडनी को बर्बाद कर गया।


बायोप्सी रिपोर्ट ने खोला राज

छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन नांदुलकर ने बताया कि मृत बच्चों की किडनी की बायोप्सी रिपोर्ट में साफ हुआ है कि टॉक्सिन मीडिएटेड इंजरी हुई है। यानी जहर ने सीधा बच्चों की किडनियों पर हमला किया।
नागपुर लैब ने भी इस बात की पुष्टि की है कि मौत का कारण दूषित कफ सिरप ही है।


दो कफ सिरप पर रोक, लेकिन जिम्मेदार कौन?

अब स्वास्थ्य विभाग ने एहतियातन Nextro-DS और Coldrif कफ सिरप की बिक्री और उपयोग पर छिंदवाड़ा व भोपाल में प्रतिबंध लगा दिया है। दोनों तमिलनाडु की एक फार्मा कंपनी से आए थे।
डॉक्टरों को भी सख्त हिदायत दी गई है कि वे इन सिरप को किसी भी मरीज को न लिखें।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि –
👉 जब मौतों का सिलसिला अगस्त से शुरू हो गया था, तो कार्रवाई इतनी देर से क्यों?
👉 सिर्फ सिरप पर रोक काफी है या निर्माताओं और दोषी अफसरों पर भी गाज गिरेगी?


पहली मौत 24 अगस्त को, लगातार बिगड़ता हालात

  • पहला संदिग्ध केस 24 अगस्त को दर्ज हुआ।
  • 4 से 26 सितंबर के बीच परासिया क्षेत्र में 6 और बच्चों की मौत हुई।
  • ज्यादातर मासूमों ने नागपुर के निजी अस्पतालों में दम तोड़ा।
  • अब तक 7 मौतें, 5 बच्चे भर्ती।

विधायक ने उठाए सवाल

परासिया से कांग्रेस विधायक सोहन वाल्मीकि ने आरोप लगाया है कि शुरुआत में स्वास्थ्य विभाग ने पूरे मामले को हल्के में लिया। अगर समय रहते जांच और रोकथाम होती, तो कई मासूमों की जान बच सकती थी।


⚠️ सबसे बड़ा सवाल

कफ सिरप पर अस्थायी रोक तो लग गई, लेकिन जिनकी वजह से यह जहर मासूमों तक पहुंचा –

  • वो फार्मा कंपनी कब कटघरे में खड़ी होगी?
  • मेडिकल स्टोर और सप्लाई चेन पर कब कार्रवाई होगी?
  • और जिम्मेदार अफसरों को उनकी लापरवाही की खुराक कब मिलेगी?

👉 यह सिर्फ बच्चों की मौत की खबर नहीं है, यह सिस्टम की घातक सुस्ती और फार्मा कंपनियों की लापरवाही की कहानी है।

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