Indore का यह ब्रिज — नवाचार नहीं, मौत का जाल है !
इंदौर।
शहर को “स्मार्ट” कहने वालों से एक सवाल —
क्या यही है आपका नवाचार?
जहाँ पुल नहीं, मौत का जाल बिछा है!
शास्त्री ब्रिज इन दिनों किसी बूढ़ी माँ के जवान बेटे की बलि मांग रहा है।
क्योंकि इस पुल के डिवाइडर को चीरकर बाहर झांक रहे 8 से 12 एमएम मोटे सरिए, किसी दिन किसी गरीब परिवार के सपनों को आर-पार चीर देंगे।
कभी किसी बाइक सवार की गर्दन कटेगी,
कभी किसी परिवार का चिराग बुझ जाएगा।
और फिर सिस्टम की वही पुरानी स्क्रिप्ट चलेगी —
नेता ट्वीट करेगा,
अफसर प्रेस नोट जारी करेगा,
और इंजीनियर जांच कमेटी बना देगा।
क्योंकि हमारे सिस्टम का फंडा साफ़ है —
“जब तक कोई मरे नहीं, फाइल नहीं खुलेगी।”
जब तक किसी माँ की चीख न गूंजे,
टेंडर नहीं बनता।
और जब तक हादसे का वीडियो वायरल न हो जाए,
नेताओं की नींद नहीं खुलती।
देखिए इन सरियों को गौर से —
रीगल से गांधी हॉल तक,
इंदौर के “नवाचार” का यह नंगा सच पड़ा है।
पहले यहाँ सीमेंट के डिवाइडर थे — मज़बूत, सुरक्षित और ऊँचे।
कोई समस्या नहीं थी।
पर “बजट खपाने” और “प्रोजेक्ट दिखाने” की होड़ में
उन्हें उखाड़ दिया गया।
अब उनकी जगह रख दिए गए हैं प्लास्टिक के खूँटे
और खुले छोड़ दिए गए हैं सैकड़ों नुकीले सरिए —
जैसे किसी दिन यहाँ इमारत नहीं, लाशें बननी हों।
कभी-कभी समझ नहीं आता,
हमारा इंदौर आगे जा रहा है या पीछे?
यह विकास है या विनाश का प्रदर्शन?
जिम्मेदार लोग अपनी एसी कारों में निकल जाते हैं,
उन्हें इन सरियों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
पर जब किसी मजदूर का बेटा, किसी रिक्शेवाले का बच्चा
यहीं गिरकर चला जाएगा —
क्या उसका परिवार नेताओं की संवेदनाओं से जिएगा?
क्या उसकी विधवा पत्नी ट्वीट से हिम्मत पाएगी?
क्या उसकी बेटी इस सिस्टम की लापरवाही में भविष्य ढूंढ पाएगी?
जिम्मेदारों से बस एक अपील —
अब संवेदनाएँ अपने पास रखिए,
और इन सरियों को काटिए,
ताकि किसी की जान जाने से पहले आपकी नींद टूटे।
